Wednesday, 3 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

दण्डकारण्य में चौदह हजार राक्षस आपस में ही एक दूसरे को मारकर समाप्त हो गए । भगवान श्रीराघवेन्द्र की विजय हुई । लक्ष्मणजी सीताजी को लेकर आते हैं । काम, क्रोध और लोभ की पराजय हो गई है । ज्ञान-भक्ति-वैराग्य पुनः एकत्रित हो गए । इन चौदह हजार राक्षसों सहित खर-दूषण के विनाश के बाद, समस्त दुर्गुणों और दुर्विचारों के दूर हो जाने बाद, ज्ञान-भक्ति-वैराग्य पुनः प्रतिष्ठित हुए ; पर क्या इससे समस्या का समूल नाश हो गया ? गोस्वामीजी कहते हैं - नहीं ! खर-दूषण तो उस रोगवृक्ष की केवल शाखा- प्रशाखाएँ थे । और उसकी जड़ कहाँ है ? सारी समस्याओं का मूल क्या है ? मोह ही इन समस्त रोगों की जड़ है । और इसलिए खर-दूषण के मारे जाने पर शूर्पणखा दिखाई तो नहीं देती पर वह जाती नहीं है । सद्विचारों के उदय होने पर वासना दिखाई नहीं देती पर वह मरती नहीं, बल्कि अन्तःकरण के किसी कोने में छिपी रहती है और दबे पाँव पहुँच जाती है मूल में अर्थात मोह के पास ।

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