Monday, 22 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ऐसा वर्णन आता है कि सहस्त्रार्जुन धर्मपूर्वक पृथ्वी पर शासन करता था । वह बड़ा पराक्रमी था । एक बार वह वन में मृगया खेलने गया । वहाँ पर उसके मन में आया कि जब यहाँ तक आ ही गये हैं तो थोड़ी दूर और चलकर महात्मा जमदग्नि को भी प्रणाम कर लें । लगता है कि यह भी उसके जीवन की सात्त्विक वृत्ति थी । रावण की तरह वह सद्वृत्तियों से शून्य नहीं था । पर उसके जीवन में एक दोष प्रबल हो गया था । रावण और सहस्त्रार्जुन के जीवन की अगर तुलना करें तो दीख पड़ेगा कि जहाँ मुनियों के आश्रमों को विनष्ट करने में रावण को आनन्द का अनुभव होता था, वहाँ सहस्त्रार्जुन के जीवन में मुनियों के प्रति आदर की वृत्ति थी, जिससे प्रेरित होकर वह जमदग्नि के आश्रम में जाता है । यहाँ तक उसकी बुद्धि स्वस्थ और अनुकूल दिखाई देती है । जब वह जमदग्नि के आश्रम पहुँचा तो जमदग्नि ने उसका स्वागत और सम्मान किया, क्योंकि ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । मननशील त्यागी महात्मा और सत्ताधीश एक-दूसरे के सहायक हो सकते हैं । शासक मुनियों के समक्ष विनत होकर उनसे प्रेरणा ले सकते हैं और सत्ताधीश मुनियों को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं । दैत्यों और राक्षसों से मुनियों की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है । यह एक स्वाभाविक क्रम है कि दोनों एक-दूसरे को महत्व दें । और वही यहाँ पर हुआ । पर आगे चलकर सहस्त्रार्जुन के जीवन में इसकी प्रतिक्रिया बड़ी प्रतिकूल हुई । राजा का स्वागत करने जब जमदग्नि बढ़े तो यह सोचते हुए कि स्वागत आश्रम की परम्परा के अनुसार किया जाय अथवा राजसिक परम्परा के अनुकूल ? उन्हें यही लगा कि ये तो राजसिक व्यक्ति हैं, इनको आश्रम के कन्द-मूल-फल सम्भवतः सुस्वादु और प्रिय नहीं लगेंगे, इसलिए इनका सत्कार तो राजसिक वैभव से किया जाना चाहिए और जब कामधेनु के माध्यम से दिव्य वैभव के साथ जमदग्नि ने सहस्त्रार्जुन का स्वागत किया तो सहस्त्रार्जुन के मन में ईर्ष्या जाग उठी ।

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