अभी कुछ दिन पूर्व कानपुर में 'मानस-संगम' के तत्वावधान में रामकथा का आयोजन किया गया था । वहाँ अनेक विचारक और विद्वान वक्ता एकत्र हुए थे । उन लोगों ने विविध रूपों में अपनी बातें रखीं । पर उनमें से कइयों का एक स्वर बड़ा ही मुखर था और वह यह कि समाज में जो इतनी अशान्ति, अव्यवस्था तथा भ्रष्टाचार व्याप्त है, तो ऐसी स्थिति में इन आयोजनों की क्या सार्थकता है ? क्या सचमुच इन आयोजनों से कोई प्रयोजन सिद्ध हो रहा है ? इस सन्दर्भ में तो हम यही कहेंगे कि चिकित्सा की अधिकता इसी बात की द्योतक है कि समाज में रोग अत्यधिक व्याप्त है । रोग की व्यापकता के कारण अगर अनेक चिकित्सकों की आवश्यकता हो जाय तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं । और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि व्यक्ति या समाज मानसिक रोगों से सदा के लिए पूर्णतया मुक्त हो जाय । किसी-न किसी प्रकार की मानसिक समस्या समाज में सदा ही विद्यमान रहती है और उसकी चिकित्सा भी की जाती है, उसे मिटाने की चेष्टा की जाती है । कभी-कभी जब समाज में भोगवाद की प्रबलता होती है तो कोई महापुरुष आकर त्याग का मार्ग प्रशस्त करते हैं ।
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