Monday, 29 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

......कल से आगे.......
सहस्त्रार्जुन या बालि बहिरंग दृष्टि से भले ही रावण को हरा दें, पर सारा विश्व तो रावण के ही वश में था । इसका अभिप्राय यह है कि रावण में मोह की वृत्ति है - मोह का अर्थ आप जानते ही हैं - जानते हुए भी अनजान की तरह आचरण करना । यह एक ऐसी बुराई है जो गहरी और सबके मूल में है । अन्य बुराइयाँ तो दिखाई देती हैं और उन्हें नष्ट करना एक हद तक सम्भव भी है, पर वृक्ष को काट देने पर जमीन के नीचे छिपी हुई जड़ों से शक्ति पाकर नए अंकुर निकल आते हैं । और इस बुराई को समूल मिटाने की शक्ति परशुराम में भी नहीं थी । बल्कि एक ओर जहाँ उनके द्वारा काम और लोभ पर कुछ नियंत्रण प्राप्त हुआ वहीं उसके साथ एक नई समस्या उत्पन्न हो गयी और वह थी अहंकार और क्रोध की । इसलिए भगवान राम के अवतार की आवश्यकता हुई । जब समाज में काम, क्रोध, लोभ सभी असंतुलित हो गये हों, ऊपर से अहंकार का डमरुआ हो गया हो और जितने भी मन के रोग हैं वे सब फैल गये हों, तब उस समय चिकित्सा करना बड़ा कठिन होता है । अगर रोग के सन्दर्भ में देखें तो इसे सन्निपात कहेंगे ।

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