काम, क्रोध, लोभ की वृत्तियाँ सन्तुलित मात्रा में हों, प्रायः ऐसा रह नहीं पाता । कभी कोई एक वृत्ति प्रबल हो जाती है तो कभी कोई दूसरी वृत्ति । जिस युग में लोभ की प्रधानता हो जाती है, उसके समाज में अर्थ को बड़ा महत्व प्राप्त हो जाता है । इसी तरह यदि किसी देश-काल में काम की वृत्ति प्रबल हो जाती है, तब वहाँ भोग ही जीवन का प्रधान लक्ष्य बन जाता है । और कभी किसी समाज में क्रोध की वृत्ति प्रबल हो जाने पर व्यक्ति और समाज में क्रोध की तीव्रतम प्रतिक्रिया हिंसा के रूप में परिलक्षित होने लगती है । इसमें एक क्रम है । जैसे किसी व्यक्ति को ज्वर हो जाता है, तो वैद्य नाड़ी से यह निर्णय करता है कि इसको किस प्रकार का ज्वर है । ज्वर का बहिरंग लक्षण मिलता-जुलता हो तो भी उसके मूल कारण अलग-अलग हो सकते हैं । वैद्य ही नाड़ी-परिक्षण के द्वारा यह निर्णय करता है कि ज्वर का मूल कारण किसकी विकृति है - वात की, पित्त की या कफ की । इसी प्रकार जब व्यक्ति और समाज अस्वस्थ हो जाते हैं, तब उसकी चिकित्सा करने महापुरुष आते हैं । तो यह रोग और औषधि का संघर्ष सदा-सर्वदा चलता रहता है ।
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