सहस्त्रार्जुन ने जब कामधेनु के विषय में जमदग्नि से सुना तब उसने जमदग्नि से कहा, महाराज ! जब आपको कुटिया में रहकर तपस्या का ही जीवन व्यतीत करना है, तो आपके पास इस कामधेनु की क्या उपयोगिता है ? इसकी उपयोगिता तो मेरे पास है । मुझे प्रजा का पालन, संरक्षण तथा संचालन करना है, और इसके लिए मुझे कामधेनु से क्षमता प्राप्त हो जाएगी । जमदग्नि ने उन्हें बता दिया कि कामधेनु मुनि के ही पास रहेगी, राजा के पास नहीं । इसका तात्पर्य क्या है ? यह कि जो मुनि है, मननशील है, विचारशील है, उसके जीवन में संकल्प मात्र से आवश्यकता की पूर्ति हो जाय तो इसमें कोई दोष नहीं है । क्योकि जो महात्मा है, उसका संकल्प सबके लिए कल्याणकारी ही होगा । पर जिस व्यक्ति के मन में भोगवासनाएँ हैं, उसे कर्मठ होना चाहिए और पुरुषार्थ के द्वारा ही अपनी कामना पूरी करने की चेष्टा करनी चाहिए ।
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