Friday, 12 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जो भूमिका हनुमानजी की है वही अयोध्या में श्रीभरत की है । इसलिए भरतजी ने गुरु वसिष्ठ से कहा कि जब समाज काम, क्रोध, लोभ से ग्रस्त हो जाय उस समय क्या यह उचित होगा कि मैं सिंहासन पर बैठ जाऊँ ? समाज में काम, क्रोध, लोभ की वृत्तियों को खुली छूट देकर क्या उन्हें शांत किया जा सकता है ? कैकेयी के इस लोभ और क्रोध को स्वीकार कर यदि मैं सिंहासन पर बैठ जाऊँ तो क्या समाज की इस समस्या का समाधान हो जाएगा । यदि मैं अपने जीवन में उन दोषों को स्वीकार कर लूँ, तो क्या अयोध्या के लोग स्वस्थ हो जाएँगे ? गुरु वसिष्ठ ने पूछा - अयोध्या के लोगों के स्वस्थ्य होने का उपाय क्या है ? तो उन्होंने यही कहा कि जिनके जाने से यह संकट आया है, उन्हें ही लौटा लाने की चेष्टा की जाए । इसका सीधा-सा अभिप्राय यह है कि काम-क्रोध-लोभ जीवन में आए तो ज्ञान-भक्ति-वैराग्य जीवन से दूर हो गए । अतः जीवन में यदि ज्ञान-भक्ति-वैराग्य फिर से प्रतिष्ठित हो जाएँ, तो स्वस्थता आ जाएगी । श्रीभरत ने यही उपाय बताया ।

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