Friday, 26 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

कामना-पूर्ति में बाधा आने पर सहस्त्रार्जुन को क्रोध आ गया । पर यह क्रोध तो परशुराम के जीवन में भी दिखाई देता है, जबकि उनके जीवन में न तो काम की स्वीकृति है, न लोभ की । उन्होंने कभी किसी के राज्य पर अधिकार नहीं किया, विवाह नहीं किया, वे बाल ब्रह्मचारी हैं । तब तो उनसे पूछा जा सकता है कि आपमें यह क्रोध कैसे आ गया ? उन्होंने कहा, लोककल्याण के लिए मैंने क्रोध को स्वीकार किया है । मैंने समाज में एक यज्ञ किया और उस यज्ञ में क्रोध को अग्निकुण्ड बनाकर अहंकारी राजाओं की आहुति दी है । परशुरामजी ने लोभ की समस्या को हल करने के लिए क्रोध को स्वीकार किया । क्रोध अहंप्रधान तो होता ही है, अब उनकी बुद्धि भी क्रोध का समर्थन करने लगी । वे भगवान राम से कहते हैं - तू ब्राह्मण के धोखे में मेरा निरादर करके बोल रहा है । यह अहं की प्रबलता है । भगवान राम ने उन्हें ब्राह्मण कहकर उनका सम्मान ही किया था, अपमान नहीं । लेकिन गोस्वामीजी लिखते हैं - परशुरामजी बिगड़कर भगवान राम से बोले, तू ब्राह्मण कहकर मेरा अपमान कर रहा है - बोलसि निदरि बिप्र के भोरे । इसका अभिप्राय क्या है ? ब्राह्मण कहकर भगवान राम ने उनका सम्मान किया कि अपमान ? ब्राह्मण जब सभी वर्गों में श्रेष्ठ और पूज्य है, तो ब्राह्मण कहकर पुकारने में उन्हें सम्मान में कमी क्यों लग रही है ? इसका रहस्य क्या है ? यह कि अहंकार जितना प्रबल होगा, सम्मान की माँग भी उतनी ही तीव्र होगी । जब भगवान राम ने ब्राह्मण कहकर पुकारा तो परशुरामजी को लगा कि ब्राह्मण तो लाखों हैं, इसने मुझे उन्हीं की बराबरी में बिठा दिया । मेरा स्थान तो सबसे ऊँचा होना चाहिए ! भगवान श्रीराघवेन्द्र झुक जाते हैं । वे कहते हैं, महाराज ! ब्राह्मण कहने में आपका अपमान होगा इसकी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता । मेरी दृष्टि में तो जो सबसे बड़ा सम्मानजनक शब्द है, वही मैंने आपके लिए कहा । लेकिन परशुरामजी क्या सुनना चाहते थे ?
       .......आगे कल......

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