वैभवशाली व्यक्ति को किसी दूसरे का वैभव देखकर प्रसन्नता नहीं होती । जब वह देखता है कि दूसरे के पास इतना वैभव है, तो उसे यह जानने की इच्छा होती है कि इतना वैभव उसके पास आया कहाँ से ! सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि से पूछ भी लिया, महाराज ! आप तो वन में स्थित एक कुटिया में निवास करते हैं, आपके पास इतना वैभव कहाँ से आया ? जमदग्नि ने भोलेपन से कह दिया, मेरे पास कामधेनु है । उस कामधेनु से मैं जो माँगता हूँ, वह मुझे देती है । यह सारा वैभव उसी का दिया हुआ है । बस इतना सुनते ही पुरूषार्थी सहस्त्रार्जुन की वृत्ति बदल गई । अब तक उसमें किसी वस्तु को पाने के लिए पुरुषार्थ की वृत्ति थी, पर अब कौन-सी वृत्ति आ गई ? कामधेनु के प्रति लोभ की । कामधेनु अर्थात बिना कुछ किए जो चाहें वह मिल जाए । पहले तो व्यक्ति यह सोचता है कि यह करेंगे तब यह मिलेगा । और कामधेनु हो तो करें कुछ नहीं, बैठे-बैठे जो चाहें वह मिल जाए । यह लोभ की पराकाष्ठा है । कुछ न करें और इच्छित वस्तु मिल जाए । पुरूषार्थी सहस्त्रार्जुन में अब बिना कुछ किए फल पाने की वृत्ति आ गई । जब तक कामना के साथ कर्म करने की वृत्ति रहती है, तब तक लोभ में सन्तुलन बना रहता है, लेकिन जब बिना कुछ किए फल पाने की वृत्ति आती है तब क्या स्थिति होती है, सहस्त्रार्जुन का चरित्र इसी का चित्र प्रस्तुत करता है ।
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