Tuesday, 9 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

......कल से आगे......
ज्ञान के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात है, स्वरूप की स्मृति । इसीलिए श्रीसीताजी ने हनुमानजी से पूछा कि हनुमान ! प्रभु तो अनन्त ऐश्वर्यशाली हैं, अनन्त शक्तिशाली हैं, अनन्त सामर्थवान हैं । तो फिर वे रावण को मारकर मुझे ले क्यों नहीं जाते ? तो स्वभाव में तो कोई बदलाव नहीं आया पर प्रभाव में तो कुछ-न-कुछ कमी आ गयी न ? क्या पहले जैसी सर्वसमर्थता अब उनमें नहीं रह गई ? तब हनुमानजी ने देखा कि स्वभाव का संकट मिटा तो अब प्रभाव का संकट आ पड़ा । उन्होंने तुरन्त माँ से कहा कि प्रभाव भी ज्यों-का-त्यों है, पर प्रभु के सामने एक समस्या है - आपके वियोगजन्य दुख में वे इतने डूब गये हैं कि उन्हें अपने बाण की महिमा का स्मरण नहीं रहा । प्रभाव है पर प्रभाव की याद नहीं है । यहाँ पर गोस्वामीजी ने बड़ी दार्शनिक बात कही कि स्मृति में ही सुख है । कोई व्यक्ति चाहे वह कोई भी क्यों न हो, अपने स्वरूप की स्मृति न रहने पर समग्र रूप से सुखी नहीं हो सकता । तो माँ ने कहा, बस, अब तुम जाकर उन्हें जयन्त की कथा सुनाना और उन्हें स्मरण दिलाना कि उनकी बाणों में कितना सामर्थ्य है । हनुमानजी जब भगवान के बाणों की महिमा बखान कर रहे थे - हे जानकीजी  ! रामबाण रूपी सूर्य का उदय होने पर, राक्षसों की सेना रूपी अन्धकार कहाँ रह सकता हैं । तब माँ बोली, मुझे क्या सुना रहे हो, उन्हें सुनाना । मैं सुनकर क्या करूँगी ? मैं तो जब प्रत्यक्ष देखूँगी, तभी मानूँगी ।

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