.......कल से आगे......
परशुरामजी चाहते थे कि श्रीराम यह स्वीकार करें कि संसार के अप्रतिम योद्धा परशुराम हैं ? भगवान राम ने कहा, महाराज ! जो शब्द आप सुनना चाहते हैं वह तो टकराहट और झगड़े की जड़ है । यद्यपि उन्होंने लक्ष्मणजी को आँख दिखाकर संकेत कर दिया था कि परशुरामजी से इस तरह बोलना ठीक नहीं है, परन्तु परशुरामजी से भी बड़ी विनम्रता से कह दिया कि महाराज ! आप इस लड़के पर बहुत रुष्ट हो रहे हैं, लेकिन क्षमा करें, सारा दोष इस लड़के का ही नहीं है । क्यों ? भगवान ने कहा - महाराज ! अगर आप फरसा लेकर न आए होते तो अवश्य ही यह आपके चरणों की धूल अपने सिर पर लगा लेता । यह फरसा ही झगड़े का कारण है । इसे जो आप कन्धे पर ढो रहे हैं, यह प्रदर्शन की वृत्ति है । दान अगर प्रदर्शन की वृत्ति से प्रेरित हो तो उसमें कोई सार्थकता नहीं रह जाती । वह तो अहंकार का पोषक हो गया है । भगवान राम ने कहा, महाराज ! यदि आप विप्र के रूप में आते तो क्या इस बालक का इतना साहस हो सकता था ? इसे तो शस्त्र प्रेरित कर रहा है । जब आप क्षत्रिय के वेश में आए हैं तो क्षत्रिय वृत्ति से इसके अन्तःकरण में आपसे टकराने की वृत्ति उठ गई । अगर आप ब्राह्मण के वेश में आते तो समन्वय हो जाता । तब यह विनम्र होकर आपके चरणों में प्रणाम करता और आप आर्शीवाद देते । प्रणाम और आर्शीवाद का सार्थक मिलन हो जाता ।
परशुरामजी चाहते थे कि श्रीराम यह स्वीकार करें कि संसार के अप्रतिम योद्धा परशुराम हैं ? भगवान राम ने कहा, महाराज ! जो शब्द आप सुनना चाहते हैं वह तो टकराहट और झगड़े की जड़ है । यद्यपि उन्होंने लक्ष्मणजी को आँख दिखाकर संकेत कर दिया था कि परशुरामजी से इस तरह बोलना ठीक नहीं है, परन्तु परशुरामजी से भी बड़ी विनम्रता से कह दिया कि महाराज ! आप इस लड़के पर बहुत रुष्ट हो रहे हैं, लेकिन क्षमा करें, सारा दोष इस लड़के का ही नहीं है । क्यों ? भगवान ने कहा - महाराज ! अगर आप फरसा लेकर न आए होते तो अवश्य ही यह आपके चरणों की धूल अपने सिर पर लगा लेता । यह फरसा ही झगड़े का कारण है । इसे जो आप कन्धे पर ढो रहे हैं, यह प्रदर्शन की वृत्ति है । दान अगर प्रदर्शन की वृत्ति से प्रेरित हो तो उसमें कोई सार्थकता नहीं रह जाती । वह तो अहंकार का पोषक हो गया है । भगवान राम ने कहा, महाराज ! यदि आप विप्र के रूप में आते तो क्या इस बालक का इतना साहस हो सकता था ? इसे तो शस्त्र प्रेरित कर रहा है । जब आप क्षत्रिय के वेश में आए हैं तो क्षत्रिय वृत्ति से इसके अन्तःकरण में आपसे टकराने की वृत्ति उठ गई । अगर आप ब्राह्मण के वेश में आते तो समन्वय हो जाता । तब यह विनम्र होकर आपके चरणों में प्रणाम करता और आप आर्शीवाद देते । प्रणाम और आर्शीवाद का सार्थक मिलन हो जाता ।
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