Monday, 8 August 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

अशोकवाटिका में हनुमानजी ने जब भगवान की सुन्दर कथा श्रीसीताजी को सुनायी, तब कथा सुनकर माँ के ह्रदय का दुख दूर हो गया । और सीताजी के मुख से निकला - किसने इतनी मधुर कथा सुनाई, वह सामने क्यों नहीं आता । और तब हनुमानजी वृक्ष से कूद पड़े । माँ ने जब देखा तो तुरन्त पीठ फेर लिया । हनुमानजी की ओर देखना भी पसन्द नहीं किया और कह दिया - नर बानरहिं संग कहु कैसे । हनुमानजी ने जैसे संगति हुई वह सारी कथा कही - कही कथा भइ संगति जैसे । - पहले कथा पर विश्वास, पर कथावाचक पर अविश्वास हो गया था । और अब कथावाचक पर विश्वास हुआ तब अचानक प्रभु के स्वभाव पर सन्देह हो गया । वे हनुमानजी से कहने लगीं - हमारे प्रभु तो पहले बड़े कोमल स्वभाव के थे, अब इतने कठोर कैसे हो गए । भक्ति सुरक्षित कब रहेगी ? भक्ति तो हम तभी कर पाएँगे जब हमें भगवान में कोमलता दिखाई देगी । यदि हमें भगवान में कठोरता दिखाई देने लगे तो उनके प्रति राग और प्रीति हो ही नहीं सकती, तो हनुमानजी ने कहा कि माँ क्षमा करना, मैं धृष्टता कर रहा हूँ, आप तो प्रभु से प्रेम करती हैं न ! बोलीं - हाँ करती हूँ । तो हनुमानजी ने कहा - बस माँ ! आप उनसे जितना प्रेम करती हैं, उससे दूना प्रेम वे आपसे करते हैं । यह सुनकर श्रीसीताजी को भगवान के स्वभाव के प्रति विश्वास तो हो गया, पर उन्होंने एक सुन्दर प्रश्न किया ।
       .......आगे कल .....

No comments:

Post a Comment