कैकेयीजी और रावण के चरित्र की अगर हम तुलना करके देखें, तो यही दिखाई देगा कि कैकेयीजी भी गम्भीर रूप से रोगग्रस्त हैं और रावण भी । दोनों में सन्निपात के लक्षण दिखाई दे रहे हैं । और दोनों के चिकित्सक श्रीभरतजी और श्रीहनुमानजी भी समान रूप से महान हैं । पर दोनों के रोग में वही एक अन्तर है, जो सन्निपात के सन्दर्भ में कहा गया । कैकेयीजी पर रोग का आक्रमण हुआ बुद्धि को केन्द्र बनाकर । मन्थरा ने उनकी बुद्धि में विभ्रम उत्पन्न कर दिया है । कैकेयी के चित्त में तो संस्कार यही था कि राम मुझसे बहुत प्रेम करते हैं, यहाँ तक कि अपनी माँ से भी अधिक । यदि उनका यह संस्कार दृढ़ बना रहता तो सम्भवतः मन्थरा की बातें उन्हें प्रभावित नहीं कर पातीं । प्रारंभ में तो प्रभावित हुई भी नहीं । जिस समय मन्थरा ने यह कहा कि कल राम को राज्य प्राप्त होने वाला है, उस समय तो प्रसन्न होकर उन्होंने यही कहा था, अगर तेरी बात सच हुई तो तू जो माँगेगी, वही दूँगी । लेकिन कैकेयी की इस भावना का आधार क्या था ? मन्थरा ने देख लिया था कि जड़ कहाँ है ? इस भाव में कि राम अपनी माँ से भी अधिक प्रेम मुझसे करते हैं । बस मन्थरा ने देख लिया कि इस प्रेम का आधार है अहं । यद्यपि वह सात्विक अहं था, पर था अहं ही । और मन्थरा ने सबसे पहले उनके इसी सात्विक अहं को उभाड़ा ।
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