आयुर्वेदशास्त्र में दो प्रकार के सन्निपातों का वर्णन है । इन दोनों में से एक प्रकार तो अयोध्या में दिखाई देता है और दूसरा लंका में । पर इन दोनों में एक अंतर है और वह अंतर आयुर्वेदशास्त्र के अनुसार यह है कि एक में मुख्य रूप से मस्तिष्क आक्रांत होता है और दूसरे में आँत । जब मस्तिष्क आक्रांत होता है, तब रोगी प्रलाप करने लगता है और ज्वर की तीव्रता से मस्तिष्क काम करना बन्द कर देता है । जब आँत आक्रांत होती है, तो पाचन-क्रिया बन्द हो जाती है और एक तरह से अतिसार हो जाता है । आयुर्वेद की मान्यता यह है कि सन्निपात से जब मस्तिष्क प्रभावित होता है, तब उसकी चिकित्सा अपेक्षाकृत सरल है, क्योंकि ज्वर में ताप अधिक होने पर सिर पर ठण्डे पानी की पट्टी रखने से उत्ताप कम हो जाता है, रोग का प्रकोप घट जाता है और रोगी स्वस्थता की ओर बढ़ने लगता है । लेकिन जब आँतों पर उसका अधिक प्रभाव पड़ता है, और सन्निपात के साथ अतिसार भी हो जाता है तो वैद्य उसे प्रायः असाध्य मानते हैं । उसकी चिकित्सा करना कठिन है । यदि मन के संदर्भ में देखें तो इसका अभिप्राय यह है कि काम, क्रोध व लोभ के दो रूप हैं । एक तो वह है जो अयोध्या में दिखाई देता है और दूसरा वह है जो लंका में, पर एक तो साध्य था और दूसरा असाध्य । एक की चिकित्सा हो गयी और दूसरे की नहीं हो पाई । एक रोगी स्वस्थ हो गया और दूसरे में रोगी की मृत्यु हो गई, सारे समाज की मृत्यु हो गई । और इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि काम-क्रोध-लोभ के साथ जहाँ अहंकार की वृत्ति सम्मिलित हो जाए, तो वहाँ बुराइयाँ असाध्य हो जाती हैं । जिस समाज या व्यक्ति के जीवन में काम-क्रोध-लोभ असंतुलित हो जाए, पर उसके अन्तःकरण में इसके लिए पश्चाताप या ग्लानि न हो तो वह स्वस्थ कैसे होगा ?
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