परशुरामजी की कृपा से समाज में उस समय काम और लोभ कुछ नियन्त्रित अवश्य हुआ था, लेकिन अहंकार या क्रोध की वृत्तियाँ उनके द्वारा नियन्त्रित नहीं हो पाईं । वे सहस्त्रार्जुन को भले ही जीत गये हों, पर रावण को नहीं जीत पाए । यद्यपि तर्क तो यही कहता है कि रावण को परास्त करने वाले सहस्त्रार्जुन को जब परशुरामजी परास्त कर देते हैं तब तो रावण पर भी उन्हें विजय मिलनी ही चाहिए थी । लेकिन नहीं मिली । क्यों ? इसका उत्तर यह है कि रावण के जीवन में दुर्गुणों का जो अतिरेक है उसे मिटाने की शक्ति परशुराम में नहीं है । सहस्त्रार्जुन की तुलना में रावण के दुर्गुण अधिक शक्तिशाली हैं । सहस्त्रार्जुन चाहे जितना पराक्रमी क्यों न हो, पर वह सारे विश्व को अपने अधीन नहीं कर पाया था, जबकि रामचरितमानस में लिखा हुआ है कि सहस्त्रार्जुन या बालि बहिरंग दृष्टि से भले ही रावण को हरा दें, पर सारा विश्व तो रावण के ही वश में था ।
.......आगे कल ......
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