जब भगवान श्रीराम चित्रकूट में कैकेयी जी की प्रशंसा करने लगे तब श्री भरत जी की आँखों में आँसू आ गये । प्रभु यह सोचकर बड़े प्रसन्न हुए कि भले ही भरत जी कैकेयी की आलोचना करते रहे हों, परन्तु आज जब मैं प्रशंसा कर रहा हूँ तो गदगद हो रहे हैं । लगता है कि मेरे भाषण का प्रभाव पड़ा, जिससे कि भरत बदल गये । उन्होंने श्रीभरत की ओर देखा और पूछा कि भरत ! अभी जो मैंने माँ की कथा सुनायी वह तुम्हें कैसी लगी ? सुनकर तुम्हारी आँखों में आँसू आ गये, लगता है तुम्हें बड़ा सुख मिला । परन्तु भरत जी ने कहा - महाराज ! आँसू कथा सुनकर नहीं आये, अपितु कथावाचक को देखकर आये । क्योंकि - मैं सोचने लगा कि जिन कैकेयी ने आपको इतना कष्ट दिया, जब उनका गुण स्वयं आप गा रहे हैं तो लगा कि आप कितने उदार हैं जो अपने को कष्ट देने वाले का भी गुण गा सकते हैं । प्रभु ! इससे मुझे उनके गुण की याद नहीं आ रही है, मुझे तो आपके गुण की याद आ रही है । यही अपनी-अपनी भिन्न दृष्टि है । और यह भिन्नता प्रत्येक क्षेत्र में है । जैसे मनुष्य की आकृति में भिन्नता है, मनुष्य के स्वभाव में भिन्नता है । अगर एक ही प्रकार के आचरणयुक्त व्यक्तियों को ईश्वर प्राप्ति का निर्देश कर दिया जाय तो आपकी मान्यता के आधार पर भले ही वह ठीक हो, लेकिन ईश्वर तो आपकी मान्यता से बँधा हुआ है नहीं । आपके जीवन की जो मान्यताएँ हैं उन्हें आपको मानना चाहिए । श्री भरत की दृष्टि भी भरत के साथ है और भगवान की दृष्टि भगवान के साथ है ।
No comments:
Post a Comment