Sunday, 15 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा - आप कृपा करके बताइए कि भगवान का अवतार क्यों होता है ? तो भगवान शंकर ने तुरन्त कहा - पार्वती ! भगवान का अवतार क्यों होता है, इस विषय में दावे से कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि बिल्कुल यही सत्य है । और ठीक इससे उल्टा एक वाक्य मिलेगा आपको रामायण के उत्तरकाण्ड में । काकभुशुण्डि जी से गरुड़ जी पूछ रहे हैं, और वहाँ काकभुणुण्डि जी दावा करते हुए कहते हैं - मैं दावा करता हूँ कि जो बात मैं कह रहा हूँ, वह बिल्कुल ठीक है । तो भई ! यह तो बड़ी विचित्र सी बात लगती है । क्योंकि गुरु कहे कि मैं दावा नहीं करता, और चेला कहता है कि मैं दावा कर रहा हूँ । शंकरजी गुरुजी हैं, वे दावा नहीं कर रहे हैं, और काकभुशुण्डि जी शिष्य हैं किन्तु वे कहते हैं कि मैं दावे से कह रहा हूँ । और जब बड़े आग्रहपूर्वक गरुड़ जी पूछते हैं तब वे सबको एक साथ जोड़ते हुए कह देते हैं कि मैं जो कह रहा हूँ यही मत ठीक मत है, तथा सबका यही मत है कि भगवान के चरणों प्रेम करना चाहिए । तो भई ! गुरुजी की बात ठीक है कि चेले की ? इसका अभिप्राय यह है कि साध्य तत्व की असीमता पर जब विचार करें, तब तो निश्चित रूप से यह कहना पड़ता है कि यह कोई दावा नहीं कर सकता कि ऐसा ही है । लेकिन कठिनाई यह है कि साध्य तत्व के वर्णन में भले ही कोई दावा न करे लेकिन जब व्यक्ति किसी साधना को स्वीकार करेगा, उस समय यदि साधना के विषय में उसके मन में आग्रह और आस्था न हो, तब तो वह कोई साधन कर ही नहीं सकता । जब भी आप साधना करते हैं तो किसी न किसी प्रकार के आग्रह को, किसी न किसी प्रकार के पक्षपात को तो स्वीकार करते ही हैं । इस प्रकार इन दोनों का सामंजस्य यही है कि अगर उपनिषद में यह दावा किया गया कि दूसरा कोई मार्ग नहीं है, और पुराणों में भिन्न-भिन्न देवताओं की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया, तो इसका उद्देश्य एकमात्र निष्ठा जाग्रत करने का है ।

No comments:

Post a Comment