Thursday, 19 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामायण में आप देखेंगे कि जितने ईश्वर से जुड़े हुए पात्र हैं, साधक हैं, भक्त हैं, उनके जीवन में परस्पर भिन्नता दिखायी देती है । और इस भिन्नता के रहस्य को जो समझ लेगा, वह साधन को ठीक-ठीक अपने जीवन में अपना लेगा । अधिकांश लोगों के जीवन में यही समस्या आती है और वे साधना करते हुए भी यह उलाहना देते हुए दिखाई देते हैं कि हम इतने दिनों से साधन कर रहे हैं पर साधन का जो फल शास्त्रों में लिखा हुआ है या प्रवचन में या सन्तों के द्वारा जो कहा जाता है, उसका अनुभव हम नहीं कर रहे हैं । इस प्रश्न का निराकरण करने के लिए दो बातें कहीं जा सकती हैं । एक तो यह कि शास्त्रों एवं व्याख्याकारों के द्वारा जो कहा गया है वही सत्य न हो । अथवा जो कहा गया है वह सत्य तो हो, पर कहीं न कहीं हमसे भूल हो रही हो ।

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