जीवनपथ के संदर्भ में उपनिषद् के एक मंत्र में दावा करते हुए कहा गया कि इस मार्ग को छोड़कर कल्याण का कोई अन्य मार्ग नहीं है - नान्यत् पन्था विद्यते अनयाय - इस प्रकार आचार्यों तथा उपनिषद् के ऋषियों ने कभी-कभी यह आग्रह तो किया, यह दावा तो किया कि मनुष्य के कल्याण का एकमात्र मार्ग यही है । लेकिन व्यापक संदर्भ में देखने पर ऐसा लगता है कि इस आग्रह का सही-सही उद्देश्य किसी पथ विशेष के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना है । आपने यदि पुराणों की परम्परा का अध्ययन किया होगा तो आपको उन विभिन्न पुराणों में भी यह बात मिलेगी । हमारे पुराणों में अलग-अलग देवताओं की प्रधानता की परम्परा है । किसी में शिव की प्रधानता मिलेगी, किसी में विष्णु की प्रधानता दिखायी देगी और किसी में सूर्य की । इस प्रकार से ईश्वर के विविध रूपों की शैली यह है कि उसमें कभी-कभी, जब एक की प्रशंसा की गयी तो उसके साथ-साथ दूसरे की निन्दा भी कर दी गयी । यद्यपि साधारण व्यक्ति पढ़कर चकरा जाता है, क्योंकि अठारहों पुराणों के रचियता अगर अलग-अलग महापुरुष होते और वे अलग-अलग बातें कहते, तब तो लगता कि भई ! सबका मत अलग-अलग है, पर जब यह दावा किया जाता है कि अठारहों पुराणों के रचयिता भगवान व्यास ही हैं तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है कि एक ही महापुरुष एक पुराण में तो भगवान शंकर की सर्वोच्चता का प्रतिपादन करे, और दूसरे पुराण में भगवान विष्णु की महिमा को सर्वोच्च बताये, तो फिर ? इसका सीधा-सा अभिप्राय यही है कि हमें पुराणों की शैली को, व्यास जी की शैली को समझने की आवश्यकता है ।
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