Tuesday, 24 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

यदि हमारे जीवन में लाभ नहीं हो रहा तो आत्मनिरीक्षण करके देखें कि हमसे कोई त्रुटि तो नहीं हो रही है । सती जी का रोग बढ़ गया तो उसके कारण हमें प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं । यद्यपि सती जी कथा की नाव में बैठीं तो, परन्तु अहंकार लेकर बैठीं कि 'मैं तो दक्ष की पुत्री हूँ ।' अगस्त्य जी ने जब पूजन किया तो वह भाव आ गया कि मैं इनकी अपेक्षा श्रेष्ठ हूँ, तो मैं क्या कथा सुनूँ इसीलिए कथा का लाभ नहीं हुआ । वैद्य पर विश्वास होना चाहिए, किन्तु भगवान राम के रूप को देखकर जब सती के अन्तःकरण में सन्देह उत्पन्न हुआ, तब भगवान शंकर ने बहुत समझाया किन्तु उनके वचनों पर विश्वास नहीं हुआ इसलिए सतीजी को दुःख उठाना पड़ा । इसे दृष्टांत के रूप में हम यों कह सकते हैं कि आप यदि विश्व के सबसे बड़े चिकित्सक को अपना चिकित्सक तो बना लें, किन्तु जब दवा करना हो तब आप अपने मन से ही दवा करें, तो क्या इससे रोग ठीक हो जायेगा ?

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