रामायण में ये जो विविध मार्गों का वर्णन किया गया है वे विविध मार्ग हैं क्या ? 'विविध मार्ग' तो यद्यपि कविता की भाषा है किन्तु विविध मार्ग का अभिप्राय है साधना के विविध रूप । और इन साधना के विविध रूपों के चुनाव में कैसे भूल होती है इसके एक दो दृष्टांत मैं आपके सामने रखूँगा । रामायण में जितने पात्र हैं, उनके चरित्र में, उनके जीवन में आपको भिन्नता दिखायी देगी । श्री लक्ष्मण जी, श्री भरत जी, श्री हनुमान जी, ये सब भगवान के महानतम भक्त हैं, पर इनके जीवन में भिन्नता दिखायी देती है कि नहीं ? जैसे - हनुमान जी महाराज ने अपने जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया, कभी विवाह नहीं किया, पर श्री भरत जी और लक्ष्मण जी के जीवन में विवाह का वर्णन है । तो बालब्रह्मचारी हनुमान जी श्रेष्ठ हैं या विवाहित भरत जी श्रेष्ठ हैं ? इसका उत्तर क्या हो सकता है ? किन्तु गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि यदि आप श्रेष्ठता तथा कनिष्ठता का निर्णय अपनी मान्यताओं के आधार पर करेंगे, तो आप उनमें से एक को श्रेष्ठ बता देंगे । जैसे यदि आपके मन में यह आग्रह है कि ब्रह्मचर्य एक बहुत ऊँची स्थिति है तो आपको लगेगा कि श्री हनुमान जी में ब्रह्मचर्य है इसलिए वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं । पर केवल इसी मान्यता के आधार पर निर्णय करना ठीक नहीं है ।
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