Wednesday, 11 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजा प्रतापभानु वन में भटककर कपट मुनि के पास पहुँच गये । कपट मुनि ने राजा से पूछ दिया - तुम्हारा नाम ? बोला - महाराज ! मैं प्रतापभानु का मंत्री हूँ । फिर प्रतापभानु ने पूछ दिया - महाराज ! आपका परिचय ? तो उसने कहा - मेरा नाम तो एकतनु है । राजा ने आश्चर्य भरे स्वर से पूछा, महाराज ! यह नाम तो संसार में कभी सुनने को नहीं मिला । इस नाम का अर्थ क्या है ? जरा यह भी बताने का कष्ट करें । उसने तुरन्त कहा कि जब आदिसृष्टि बनी तभी मेरी उत्पत्ति हुई । और तब से मेरा एक ही शरीर है इसीलिए मैं एकतनु हूँ । प्रतापभानु ने कहा - महाराज कोई सेवा ? लेकिन कपट मुनि बोला - मुझे कुछ नहीं चाहिए ? गोस्वामीजी ने कहा - कपट मुनि जितनी उदासीनता दिखाता है, राजा के अन्तःकरण में उतनी ही श्रद्धा यह सोचकर बढ़ती जा रही है कि महाराज जंगल में रहते हैं, अभी तक मृत्यु नहीं हुई, यह सचमुच बड़े त्यागी हैं । अन्त में प्रतापभानु कहने लगा कि महाराज ! मैं आपसे जरा झूठ बोल गया था, वस्तुतः मैं प्रतापभानु का मंत्री नहीं हूँ । कपट मुनि ने हँसकर कहा कि मैं तो पहले ही जान गया कि तुम प्रतापभानु हो । तो महाराज ! आप नाराज तो नहीं हैं ? उसने व्यंग्य भरी भाषा में कहा - यह जो तुमने मुझसे झूठ बोला, मुझे बड़ा अच्छा लगा । किसी महात्मा से कोई झूठ बोल दे और उसे अच्छा लगे ऐसा तो होता नहीं है । किन्तु इसे अच्छा क्यों लगा ! वस्तुतः उसके मन में विचार आया कि मैं कपट शुरु करने वाला था ही, पर अब तुमने स्वयं ही अपनी ओर से पहल कर दी तो अब मुझे पाप नहीं लगेगा । इसका अभिप्राय है कि यद्यपि दोनों ही कपटी हैं किन्तु जो बड़ा कपटी होगा वह बाजी ले जाएगा ।

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