Tuesday, 17 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान श्रीकृष्ण से गीता में समस्त योगों का वर्णन सुनने के पश्चात अर्जुन ने भगवान से कहा - महाराज ! आप जो बातें सुना रहे हैं उनसे तो मैं बड़े चक्कर में पड़ गया हूँ - क्योंकि आप कभी संन्यास योग की बात कहते हैं तो कभी कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं । और मैं जब आपके मुख से इस प्रकार मिली-जुली बात सुनता हूँ तो उससे मेरे मन में भ्रम उत्पन्न होता है । इसलिए अर्जुन ने कहा - आप कृपा करके बता दीजिए कि मुझे क्या करना है और तब भगवान अर्जुन से एक बड़ी विचित्र बात कहते हैं कि अर्जुन ! तुम सभी धर्मों का परित्याग कर मेरी शरण में आ जाओ । किन्तु भई ! प्रश्न यह उठता है केवल यही एक श्लोक भगवान प्रारंभ में कह देते और अर्जुन उसको स्वीकार कर लेता, किन्तु ऐसा क्यों नहीं किया ? यदि हम विचार करके देखें तो हमें यह लगेगा कि इसके द्वारा भगवान ने एक ओर तो जितने भी पक्ष समाज में हो सकते हैं उन सबका सांगोपांग वर्णन किया, परन्तु दूसरी ओर जब अर्जुन ने कहा महाराज ! यह तो आपने सबके लिए बताया पर अब मेरे लिए कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर है आप यह भी तो बताइए और भगवान कहते हैं कि तुम्हें तो बस शरणागति मार्ग का ही अनुगमन करना चाहिए । इसका तात्पर्य है कि मार्ग अनगिनत हैं । मार्ग अनगिनत होने के दो तात्पर्य हैं । एक तो लक्ष्य की भिन्नता से मार्ग में भिन्नता होती है । क्योंकि अगर किसी को अलग-अलग नगर में जाना हो, तो उसके लिए अलग-अलग मार्ग होंगे । लेकिन याद रखिए कि केवल लक्ष्य की भिन्नता से ही मार्ग में भिन्नता नहीं होती । बल्कि लक्ष्य के एक होने पर भी मार्ग में भिन्नता होती है ।

No comments:

Post a Comment