रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में जहाँ पर गोस्वामीजी मानस रोगों का वर्णन करते हैं वहाँ पर वे अत्यंत सांकेतिक रूप में उचित साधन के विषय में वर्णन करते हैं । इसे हम यों कह सकते हैं कि जैसे रोग दूर करने के दवा, वैद्य तथा पथ्य ये तीन साधन हैं । और हमें यह स्पष्ट दिखायी देता है कि रोग को ठीक-ठीक पहचान करने वाला वैद्य अथवा डाक्टर यदि न मिले, तो भी आप ठीक नहीं होंगे । बहुत अच्छी दवा बताने वाला वैद्य भी मिल जाय, पर अगर दवा ही बाजार में नकली मिले, तो नुस्खा किस काम आवेगा ? और असली दवा भी मिल गयी, उसे लेकर खाने लगे, पर जितनी दवा नहीं खा रहे हों उससे अधिक यदि कुपथ्य कर रहे हों तो फिर दवा भी फायदा नहीं करेगी । जीवन में लाभ नहीं हो रहा तो ढूँढ़िये कि कौन सी कमी रह गयी है ? कहीं सद्गुरु की कमी तो नहीं रह गयी, कहीं कपट मुनि जैसा नकली गुरु जैसे प्रतापभानु को मिला, वैसे ही हमें भी तो नहीं मिल गया है । कहीं कालनेमि की तरह वैद्य तो नहीं मिल गया ? क्योंकि कालनेमि के समान वैद्य मिलने पर भी समस्या रहेगी । पर अगर भगवान शंकर के समान योग्य वैद्य मिल गया तब तो कोई समस्या नहीं है । लेकिन केवल सद्गुरुरुपी वैद्य होने से ही काम नहीं चलेगा अपितु उसके वचनों पर विश्वास भी होना चाहिए । भक्ति की दवा हो किन्तु उसके साथ श्रद्धा का अनुपान अवश्य हो। और उसके पश्चात विषय में कुपथ्य का परित्याग भी हो । जब इतनी वस्तुएँ एकत्रित होती हैं तब कहीं जाकर मन के रोगों का नाश होता है ।
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