रामायण के महानतम पात्र बाल ब्रह्मचारी श्री हनुमान जी और सबसे दुर्बल चरित्र वाले सुग्रीव । दोनों यदि दूर होते तो कोई बात नहीं । परन्तु इससे बढ़कर विचित्र बात कोई और नहीं हो सकती कि ये दोनों पात्र अत्यंत निकट हैं । जीवन भर हनुमान जी तथा सुग्रीव में वही भावना रही । हम लोगों के जीवन में एक दुर्बलता होती है कि जब हमारा किसी मान्यता-विशेष के प्रति बहुत आग्रह होता है तो हम दूसरों को भी केवल उसी आधार पर परखना चाहते हैं । हाँ ! अपनी मान्यता पर हम खरे उतरें, अपनी मान्यता के अनुकूल हम अपना जीवन बनायें यह तो उचित है । हनुमान जी अगर कहीं अपनी कसौटी पर सुग्रीव को कसकर देखते, तब तो सुग्रीव से जीवन में न जाने कब का साथ छूट गया होता । किन्तु हनुमान जी ऐसा नहीं करते हैं । और भगवान श्रीराघवेन्द्र भी सुग्रीव, अंगद और हनुमान जी से एक ही प्रकार का व्यवहार नहीं करते । और न ही ये तीनों प्रभु से एक ही प्रकार के व्यवहार की आशा करते हैं । रामचरितमानस में यह भिन्नता आपको दिखायी देगी ।
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