मार्ग का निर्णय केवल लक्ष्य से ही नहीं होगा, अपितु मार्ग का निर्णय इस बात से होगा कि आप किस नगर के रहने वाले हैं । इसका अभिप्राय है कि एक ही स्थान पर जाने वाले व्यक्ति, अगर अलग-अलग नगरों में रहते हैं, तो उनके मार्ग भिन्न-भिन्न हो जायेंगे । इसी तरह जिनके जीवन में एक ही लक्ष्य 'ईश्वर की प्राप्ति' होता है उनके जीवन में भी मार्ग की भिन्नता होती है । इसलिए रामचरितमानस और गीता में समन्वय का यही जो तत्व है, वह आपको पूरी तरह मिलेगा । गीता में कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा समर्पण योग की समग्रता आपको मिलेगी । और श्री रामचरितमानस में भी इसी समन्वय सूत्र का प्रतिपादन करते हुए एक ओर कहा गया कि सत्य के विषय में दावा नहीं किया जा सकता । यह भी एक पक्ष है, और काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि मैं दावे से कह रहा हूँ, यह दूसरा पक्ष है । गोस्वामीजी ने कहा - भई ! जो वक्ता जहाँ पर बैठा है, वो वहीं से बोलता है । परन्तु गोस्वामीजी स्वयं ऐसा दावा नहीं करते । तुलसीदास जी बोले कि काकभुशुण्डि जी भक्ति के आचार्य हैं, वे तो दावा कर सकते हैं, लेकिन मैं वैसा दावा कैसे करूँ ? इसका तात्पर्य है कि आचार्य, आचार्य की भाषा में बोलेगा । सन्त सन्त की भाषा में बोलेगा । भक्त, भक्त की भाषा बोलेगा और कर्मयोगी, कर्मयोगी की भाषा में बोलेगा । आप जिस नगर में रहते हैं, वहीं से यात्रा प्रारंभ करेंगे । इसलिए आपका मार्ग निश्चित रूप से एक कभी नहीं हो सकता । जितने सही मार्ग पर चलने वाले साधक हैं उनके मार्ग में भी भिन्नता है ।
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