Wednesday, 18 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मार्ग का निर्णय केवल लक्ष्य से ही नहीं होगा, अपितु मार्ग का निर्णय इस बात से होगा कि आप किस नगर के रहने वाले हैं । इसका अभिप्राय है कि एक ही स्थान पर जाने वाले व्यक्ति, अगर अलग-अलग नगरों में रहते हैं, तो उनके मार्ग भिन्न-भिन्न हो जायेंगे । इसी तरह जिनके जीवन में एक ही लक्ष्य 'ईश्वर की प्राप्ति' होता है उनके जीवन में भी मार्ग की भिन्नता होती है । इसलिए रामचरितमानस और गीता में समन्वय का यही जो तत्व है, वह आपको पूरी तरह मिलेगा । गीता में कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग तथा समर्पण योग की समग्रता आपको मिलेगी । और श्री रामचरितमानस में भी इसी समन्वय सूत्र का प्रतिपादन करते हुए एक ओर कहा गया कि सत्य के विषय में दावा नहीं किया जा सकता । यह भी एक पक्ष है, और काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि मैं दावे से कह रहा हूँ, यह दूसरा पक्ष है । गोस्वामीजी ने कहा - भई ! जो वक्ता जहाँ पर बैठा है, वो वहीं से बोलता है । परन्तु गोस्वामीजी स्वयं ऐसा दावा नहीं करते । तुलसीदास जी बोले कि काकभुशुण्डि जी भक्ति के आचार्य हैं, वे तो दावा कर सकते हैं, लेकिन मैं वैसा दावा कैसे करूँ ? इसका तात्पर्य है कि आचार्य, आचार्य की भाषा में बोलेगा । सन्त सन्त की भाषा में बोलेगा । भक्त, भक्त की भाषा बोलेगा और कर्मयोगी, कर्मयोगी की भाषा में बोलेगा । आप जिस नगर में रहते हैं, वहीं से यात्रा प्रारंभ करेंगे । इसलिए आपका मार्ग निश्चित रूप से एक कभी नहीं हो सकता । जितने सही मार्ग पर चलने वाले साधक हैं उनके मार्ग में भी भिन्नता है ।

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