प्रतापभानु के जीवन में सफलता के पश्चात जब विफलता आयी तो उसने उसे भी यदि गीता के 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' - के रूप में लिया होता तो कष्ट नहीं आता । प्रतापभानु यद्यपि दिखावा तो यही करता था कि मेरे मन में फल की कोई इच्छा नहीं है क्योंकि मुझे तो तत्वज्ञान हो चुका है, लेकिन दिखावे के लिए ऐसा भाषण देने वाला राजा फलाकांक्षा से इतना ग्रस्त था कि जिस समय शूकर पर उसका बाण नहीं लगा उस समय उसे क्रोध आ गया । असफलता में शान्ति अथवा ईश्वर की स्मृति नहीं आयी, अपितु क्रोध आ गया । और तब महत्वकांक्षा के वन में क्रोध से भरा हुआ प्रतापभानु लोभ के शूकर का पीछा करने लगा । रामायण में कहा है कि - काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ - और क्रोध से भरकर लोभ के शूकर का पीछा करता हुआ प्रतापभानु अन्त में जंगल में मार्ग भूल जाता है । इसका अभिप्राय है कि जब कोई जीवन में इस तरह चलेगा तो संसार में उसका मार्ग भूलना अवश्यंभावी है ।
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