गोस्वामीजी कहते हैं कि जब शूकर का पीछा करते हुए मंत्री एवं सेनापति राजा प्रतापभानु से पीछे छूटकर अलग हो गये तब राजा 'अति अकेल' - अत्यंत अकेला हो गया । तुलसीदास जी का अभिप्राय मानो यही है कि जब आप सफल होंगे तब तो आपके साथ सब लोग होंगे और जब आप विफल होंगे तो ये सब आपसे बिछुड़े बिना नहीं रहेंगे, साथ छोड़े बिना नहीं रहेंगे । गोस्वामीजी ने कहा कि इसी प्रकार आज असफल होने पर वह राजा बेचारा अत्यंत अकेला हो गया । वैसे व्याकरण की परम्परा है कि जहाँ एक शब्द से काम चले वहाँ पर दो शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । इस दृष्टि से यहाँ पर तुलसीदास जी का यह वाक्य कुछ अटपटा सा दिखायी देता है । क्योंकि अकेल माने एक और 'अति अकेल' माने भी एक ही है । तो लगता है कि यहाँ पर अति शब्द का प्रयोग व्यर्थ किया गया है । तुलसीदास जी का अभिप्राय है कि भले ही व्यक्ति आपको अकेले जाता हुआ दिखायी दे रहा हो पर अगर वह मन में ध्यान करता हुआ चल रहा हो कि हमारे आगे भगवान चल रहे हैं, इस प्रकार चलता हुआ व्यक्ति अकेला भले ही दिखायी दे, पर वस्तुतः वह अकेला कहाँ है, क्योंकि वह तो भगवान के साथ है । गोस्वामीजी का तात्पर्य है कि अकेले होने के बाद भी अगर प्रतापभानु को भगवान की याद आ जाती तब तब तो कहना ही क्या था ? 'अति अकेल' माने जब बाहर के सब लोग साथ छोड़ ही दें और भीतर भगवान की भी याद न रह जाय तब हम अकेले नहीं, अति अकेले हैं ।
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