Sunday, 22 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

काकभुशुण्डि जी मन के रोगों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले वैद्य खोजिये । और वह वैद्य है सद्गुरु । रामायण में तो सबसे बड़े सद्गुरु भगवान शंकर हैं । और वे शंकर जी सद्गुरु के रूप में रावण को प्राप्त हैं । वे ही शंकर जी सती के पति भी हैं, और ' पतिदेवः गुरुः स्त्रीणाम्' के रूप में सती जी के भी गुरु हैं । यद्यपि शंकर जी तो त्रिभुवन गुरु हैं । पर कितनी बड़ी विडम्बना है ? भगवान राम से शंकर जी ने यही कहा कि प्रभु ! आपने जनकनन्दिनी के वियोग में जो रुदन लीला की, उसमें तो मुझे बड़ा विचित्र सा अनुभव हुआ । क्योंकि मैं तो समझे बैठा कि मैं त्रिभुवन गुरु हूँ, लेकिन महाराज ! आपके स्वरुप के विषय में भ्रम ही हुआ तो मेरे परिवार में हुआ । या तो सती जी भ्रम हुआ या रावण को ।
     .....आगे कल ....

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