राजा प्रतापभानु के महत्वकांक्षा के विन्ध्याचल में भटकने का अन्तिम परिणाम यह हुआ कि वह रावण बन गया, राक्षस बन गया । विन्ध्याचल की दूसरी कथा में जब विन्ध्याचल सूर्य का प्रकाश रोकने के लिए ऊपर उठने लगा तो अगस्त्य जी कहा गया कि महाराज ! किसी तरह से आप ही इस समस्या का समाधान कीजिए । अगस्त्य जी जब विन्ध्याचल के समीप पहुँचे तब विन्ध्याचल ने सोचा कि संत आये हैं तो प्रणाम करना चाहिए । इसलिए विन्ध्याचल ने तुरंत संत के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया तथा अगस्त्य जी से पूछ दिया - महाराज ! क्या आज्ञा है ? अगस्त्य जी ने कहा - मैं दक्षिण भारत की यात्रा पर जा रहा हूँ, जब तक लौटकर नहीं आता तब तक इसी तरह पड़े रहो । और संत की आज्ञा मानकर विन्ध्याचल वैसा ही पड़ा रह गया । बहुत दिनों तक जब अगस्त्य जी नहीं लौटे, तो किसी ने कहा - वे महात्मा तो गये, अब वे नहीं लौटेंगे, उठो ! उठो ! किन्तु विन्ध्याचल ने कहा कि जब महात्मा ने आदेश दिया है तो मैं महात्मा के आदेश को नहीं टाल सकता । पर जब भगवान श्रीराघवेन्द्र को विन्ध्याचल ने आते देखा तो गदगद हो गया । विन्ध्याचल सोचने लगा, मैं तो केवल यही चाहता था कि सूर्य मेरी परिक्रमा करे, पर जिस ईश्वर के शरीर में कोटि-कोटि ब्रह्मांड हैं, कोटि-कोटि सूर्य हैं, वह स्वयं जब मेरी परिक्रमा करने आ गया तब इससे बढ़कर बड़प्पन भला क्या होगा ? मुझे तो वस्तुतः भगवान प्राप्ति के मार्ग का बड़प्पन मिल गया । इस प्रकार महत्वकांक्षा के मार्ग के ये दो प्रसंग हैं । इनमें एक मार्ग रावण का है, और दूसरा पथ वह है जिसके द्वारा विन्ध्याचल को भगवान प्राप्ति के बड़प्पन की उपलब्धि होती है । उसका पथ यही है कि सत्संग के माध्यम से हम सही मार्ग पर चलें तथा महत्वाकांक्षा को भगवान से जोड़ दें ।
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