Monday, 23 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

 .....कल से आगे.....
भगवान की भक्ति को सर्वोत्तम औषध के रूप स्वीकार करते हुए लिखा गया है कि - 'रघुपति भगति सजीवनि मूरी ।' - और भक्ति की यही दिव्य दवा सती जी को दी जा रही थी । क्योंकि शंकर जी सती जी को कथा सुनाने के लिए अगस्त्य जी के पास लेकर गये, और कथा का श्रवण - 'दूसर रति मम कथा प्रसंगा' - के अनुसार भक्ति ही तो है । इसका अभिप्राय है कि यहाँ पर शंकर जी के रूप में वैद्य भी बहुत बढ़िया है, भक्ति के रूप में दवा भी सर्वोत्तम है, लेकिन फिर भी बात उल्टी हो गयी । क्योंकि सती का रोग बढ़ गया । सती जी भगवान शंकर के साथ कथा में गयीं । गोस्वामीजी कथा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मैं सन्देह, मोह और भ्रम को दूर करने वाली तथा संसाररुपी नदी को पार करने वाली कथा सुना रहा हूँ । और आप याद रखियेगा कि कथा नाव तो है, पर नाव डूबती हुई दिखायी देती है कि नहीं ? इसका सीधा सा तात्पर्य है कि यद्यपि नाव तो अत्यंत सुदृढ़ होना ही चाहिए, पर नाव बहुत बढ़िया होने के बाद भी अगर बैठने वाले व्यक्ति असंतुलित हो जायँ, यात्री यदि सम्भल कर न बैठें तो नाव अवश्य डूब जायेगी । बढ़िया नाव में भी जितना बोझ उठाने की सामर्थ्य होगी अगर उससे ज्यादा बोझ लाद दिया जायेगा तो भी नाव डूब जायेगी । कथा की नाव में यद्यपि बोझ उठाने की बड़ी सामर्थ्य है लेकिन इतना होते हुए भी कथा की नाव में अहंकार का बोझ उठाने की सामर्थ्य नहीं है । अगर कोई अहंकार का भार लेकर कथा की नाव में बैठेगा तो नाव के डूबने की संभावना अधिक रहेगी ।

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