त्रिवेणी के पावन तट पर महर्षि भरद्वाज से भगवान श्रीराघवेन्द्र का मार्ग के सन्दर्भ में जो प्रश्न है, जो जिज्ञासा है कि मैं किस मार्ग से जाऊँ, वस्तुतः यह प्रश्न भौतिक मार्ग से अधिक संबंधित नहीं है । इसमें व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवनपथ के संबंध में संकेत छिपा हुआ है । भगवान श्री राघवेन्द्र जब यह कहते हैं कि मैं किस मार्ग से जाऊँ ? तो प्रश्न में ही यह तात्पर्य छिपा हुआ है कि यद्यपि मार्ग तो कई हैं, पर कुछ मार्ग ऐसे हैं जिन्हें हम बुरा मार्ग कहते हैं और संसार के अधिकांश व्यक्ति इसी मार्ग पर चल रहे हैं । क्योंकि अधिकांश प्राणी काम, क्रोध अथवा लोभ के मार्ग पर ही चलते हुए दिखायी देते हैं । और यह सर्वथा स्वाभाविक है कि उस पथ का अनुगमन करता हुआ व्यक्ति गोस्वामीजी तथा गीता के शब्दों में नरक की दिशा में बढ़ता हुआ अन्त में नरक के द्वार में प्रविष्ट हो जाता है । लेकिन जिन मार्गों को हम कल्याणकारी मार्ग कहते हैं, उन मार्गों में भिन्नता है या नहीं ? क्या किसी मार्ग के विषय में दावे से यह कहा जा सकता है कि संसार में समस्त प्राणियों के लिये एक मात्र यही मार्ग है ? आने वाले दिनों में इस पर विचार करेंगे ।
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