Tuesday, 10 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजा प्रतापभानु वन में मार्ग भूल गया । लेकिन मार्ग भूलने के बाद भी यदि महर्षि भरद्वाज मिल गये होते तो काम बन जाता । परन्तु प्रतापभानु को मार्गदर्शक कौन मिला ? गोस्वामीजी ने संकेत किया कि राजा को जो महापुरुष मिला, वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसका राज्य प्रतापभानु ने छीन लिया था । लेकिन उसने निर्णय कर लिया था कि वह प्रतापभानु से बदला अवश्य लेंगे । ऐसा सोचकर उसने तुरन्त साधु का वेष बनाया तथा जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगा और यह शूकर जो था, जिसके पीछे राजा भागा था, वह वस्तुतः असली शूकर नहीं था । ऊपर से दिखायी दे रहा था आकर्षक शूकर पर भीतर से राक्षस था । और यह प्रतापभानु को भटकाकर ले गया उसी कपट मुनि के आश्रम में । कपट-मुनि के आश्रम में जाकर उसने देखा कि आश्रम सुन्दर है, मुनि ने सुन्दर वस्त्र पहनकर रखा है, उसे लगा कि आज तो बहुत बड़े महात्मा का दर्शन मुझे हो गया । उसने महानता का लक्षण भी क्या मान लिया ? सुन्दर वेष देखकर राजा ने निर्णय किया कि ये तो बहुत बड़े महात्मा हैं । अगर महात्मा का लक्षण यही माना जाय कि जो बात बढ़िया बनाने तथा वेष बनाने में जितना अधिक निपुण है, वह उतना ही ऊँचा, महात्मा है तो वही स्थिति होगी जो प्रतापभानु की हुई । इसीलिए संत के लक्षणों में यह कहीं नहीं कहा गया है कि जो इस प्रकार के वेष में हो, वह संत है ।

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