भगवान विभीषण को भी मित्र कहकर पुकारते हैं तथा उनसे भी एक अनोखा नाता जोड़ते हैं । विभीषण जी न तो निषादराज के समान हैं और न ही सुग्रीव के समान । क्योंकि निषादराज अत्यंत ऊँचाई पर हैं और सुग्रीव का चरित्र अत्यंत निम्न धरातल पर स्थित है । परन्तु विभीषण जी के जीवन में कुछ त्याग भी है, पर वासना पूरी तरह से नहीं मिटी है । यद्यपि विभीषण जी जब चले तो राज्य सम्पत्ति और परिवार इत्यादि सब छोड़कर चले । अगर त्याग करने की क्षमता उनमें न होती तो कैसे इतना बड़ा त्याग कर पाते ? पर इतना होते हुए भी वे पूर्णरूपेण वासना शून्य नहीं थे । जब लंका से चले तो मार्ग में विचार करने लगे कि प्रभु मुझे शरण में लेंगे या नहीं ? और तब उन्हें सुग्रीव की याद आयी कि मुझसे पहले जब सुग्रीव को शरण में लिया है तो मुझे भी लेंगे । सुग्रीव और मेरी स्थिति एक ही प्रकार की है । सुग्रीव अपने बड़े भाई के द्वारा संत्रस्त थे, मैं भी बड़े भाई से सताया गया हूँ । और फिर बुद्धि ने तुरन्त तुलना करते हुए कहा कि प्रभु ने सुग्रीव को शरण में लिया तो बालि का वध किया, इसी प्रकार मुझे शरण में लेंगे तो रावण का वध करेंगे । और जब इतनी दूर तक तुलना हो गयी तो धीरे से अत्यंत सुक्ष्म वासना बोल पड़ी कि जब राम ने बालि को मारा तो सुग्रीव को राज्य मिला, और जब रावण को मारेंगे तो तुम्हें ही तो राज्य मिलेगा । यद्यपि यह मुख्य धारणा उनकी नहीं थी, वे कोई लंका के राज्य के लोभ में श्रीराम की शरण में नहीं आये थे । पर चलते-चलते यह बात भी मन में आ गयी ।
.....आगे कल ......
.....आगे कल ......
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