भगवान किसी को सम्पत्ति देते हैं, किसी को सुख और समृद्धि देते हैं, यह भगवान की कृपा है कि नहीं ? कुछ लोग ऐसे हैं जो कहेंगे कि नहीं । और कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कहेंगे कि भई ! भगवान की कृपा तो बस यही है । पर वस्तुतः यह बात यथार्थ नहीं है । यदि हम विचार करके देखें तो हमें यह दिखायी देगा कि भगवान की कृपा तो हमारे जीवन में भिन्न-भिन्न रूपों में उसी प्रकार से होती है जैसे एक नन्हें बालक को माँ जब प्रेम से मिठाई खिलाती है तो क्या आप समझते हैं कि केवल मिठाई खिलाने में ही माँ का प्यार है ? यद्यपि माँ जब मिठाई खिलाती है, बच्चे को खिलौने देती है, बालक को वस्त्रों से सजाती है, तो उसमें भी बालक के प्रति माँ का अत्यंत अनुराग है और इसके द्वारा बालक को माँ के स्नेह का भान होता है, बालक के मन में बड़ी प्रसन्नता होती है कि माँ मुझसे इतना स्नेह करती है कि इतनी बढ़िया मिठाई खिलायी, इतना सुन्दर खिलौना लाकर मुझे दिया है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि माँ जब ये वस्तुएँ देती हैं तब भी माँ का स्नेह और वात्सल्य बालक के प्रति है । लेकिन माँ का वात्सल्य केवल इतना ही नहीं है । माँ के वात्सल्य का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर एक बालक अस्वस्थ हो जाय, और वैद्य या डाक्टर बालक को ऐसी दवा दें जो खाने में अत्यंत कड़वी हो, उस समय भी माँ के मन में बालक के प्रति उतना ही प्रेम होता है । इसका अभिप्राय है कि केवल यह मानना ही उपयुक्त नहीं है कि दवा देना ही माँ का प्रेम है, और न ही यह मानना ही उपयुक्त है कि मिष्ठान्न देना ही माँ का प्यार है, वरन माँ चाहे मिठाई दे या दवाई दे, दोनों के मूल में बालक के प्रति हित की भावना, बालक के प्रति स्नेह ही विद्यमान है । और हम सब भगवान के बालक ही तो हैं ।
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