रामायण में यह कहा गया है कि तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं - सिध्द, साधक और विषयी । निषादराज सिध्द श्रेणी में । वे भावना और भक्ति की दृष्टि से इतने ऊपर उठे हुए हैं कि शरीर में रंचमात्र भी उनकी आसक्ति नहीं रह गयी है । इस बात का पता तब चलता है जब भरतजी सेना सहित आ रहे हैं । कहाँ अयोध्या की सेना और कहाँ निषादराज का छोटा सा गाँव ? पर जब निषादराज अपने गाँव वालों को एकत्र करके कहते हैं कि - *सनमुख लोह भरत सन लाऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ।।* - मानो शरीर से वे सर्वथा ऊपर उठे हुए हैं । अपने शरीर को वे भगवान राम की सेवा में समर्पित कर देते हैं । अगर कोई पूछ दे कि क्या श्री भरत से लड़कर आप जीत सकते हैं ? तो निषादराज ने कहा कि पशु अगर मारा जाय तो भी उसके चमड़े से जूता बनता है । और जूता जिसके चरण में आता है उसको काँटों से बचाता है । उसी प्रकार से अगर हम मरकर भी प्रभु को काँटों से बचा सकें तो हमारी मृत्यु की सार्थकता है । यह वृत्ति देह से ऊपर उठकर विदेह की वृत्ति है । उनमें इतनी निष्कामता है कि भगवान से पाने की कोई आकांक्षा नहीं है । और भगवान श्री राघवेन्द्र भी उन्हें मित्र के रूप में सम्मान देते हैं, तथा मित्रता के प्रति यह सम्मान राज्याभिषेक के पश्चात भी ज्यों का त्यों बना हुआ है ।
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