भगवान बालि के ऊपर जब बाण का प्रहार करते हैं तब बालि उलाहना देता हुआ कहता है कि मैं बैरी हो गया और सुग्रीव आपको प्यारा हो गया । इसीलिए आपने मेरे ऊपर प्रहार किया । किन्तु क्या सचमुच भगवान बालि को मारना चाहते थे ? बालि का वाक्य सुनकर प्रभु ने कहा - बालि ! तुम्हारे ऊपर तो मुझे बाध्य होकर बाण चलाना पड़ा । वस्तुतः मेरे बाण चलाने का अभिप्राय यही है कि जैसे फोड़ा हो जाने पर चिकित्सक को अस्त्र का भी प्रयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार अभिमान भी एक फोड़ा है, और यदि अभिमान का फोड़ा व्यक्ति को हो जाय, तो रामायण में एक नन्हें बालक का दृष्टांत देकर उसका उपचार बताते हुए गोस्वामीजी कहते हैं - जैसे बालक के शरीर में फोड़ा होने पर माँ कठोर बनकर उस फोड़े को चिरवाने का प्रयत्न करती है ठीक उसी तरह भगवान ने भी बालि के मन में जो अभिमान का फोड़ा हो गया था, उसको काट दिया । और जैसे ही फोड़ा ठीक हुआ, त्योंही भगवान बालि से कहने लगे - तुम जीवित रहो । लेकिन बालि ने कहा - महाराज ! अब तो मैं जीवित नहीं रहना चाहता । क्योंकि मेरे जीवन की सार्थकता तो हो गयी । तो भगवान ने तुरन्त कहा - अच्छा भई ! तुम अगर यहाँ नहीं रहना चाहते हो तो जाओ तुम मेरे धाम पर अधिकार कर लो । तुम्हारा धाम मैंने सुग्रीव को दे दिया है इसीलिए मेरा धाम तुम ले लो ।
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