Monday, 20 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम ने तीन को मित्र बनाया और तीनों मित्र भिन्न-भिन्न जाति के हैं, भिन्न-भिन्न भूभाग के हैं । उत्तरी भाग के निषादराज हैं, मध्य भाग के वानरराज तथा दक्षिण भाग के निशाचरराज । एक निषाद, दूसरे बन्दर तथा तीसरे राक्षस । पर भगवान राम की विशेषता यह है कि वे प्रत्येक को उसी के अनुरूप उपदेश देते हैं और मात्र उपदेश ही नहीं देते बल्कि स्वयं को भी उसी रूप में व्यक्त करते हैं । इसका दूसरा सांकेतिक अभिप्राय है कि मानो प्रभु ने हम लोगों को आश्वस्त कर दिया कि चाहे आप विषयी हों चाहे साधक हों या सिध्द हों, परन्तु आप मेरे मित्र हैं । उपनिषद् भी कहते हैं कि ब्रह्म और जीव दोनों सखा हैं । किन्तु समस्या यह है कि हम भटककर अपने सखा से दूर आ गये हैं । जीव को अपने मित्र के संबंध की विस्मृति हो गयी है । परन्तु भगवान इन मित्रों के माध्यम से मानो संसार के समस्त प्राणियों को निमंत्रण देते हैं ।

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