भगवान श्रीराम सुग्रीव को सकाम रूप में देखते हैं, और सकाम सुग्रीव के सामने प्रभु सकामता को महत्व देते हैं । कभी-कभी भगवान श्रीराघवेन्द्र से अगर कोई भक्त पूछ देता है कि महाराज ! आप सुग्रीव जैसे व्यक्तियों को इतना सम्मान क्यों देते हैं ? तो भगवान कहते हैं कि भाई ! मैं तो अपने नियम का ही पालन करता हूँ । महाराज ! आपका नियम क्या है ? तो प्रभु ने कहा - भई ! मेरा नियम है कि जो मेरा जिस भाव से भजन करते हैं मैं भी उनका उसी भाव से भजन करता हूँ । लेकिन महाराज ! आप सम्मान क्यों देते हैं ? तो भगवान ने कहा कि मेरा सारा सम्मान तो उन्ही की कृपा पर निर्भर है । क्योंकि जो निष्काम भक्त हैं उनसे उनकी स्वयं की महिमा तो बहुत बढ़ती है पर मेरी महिमा नहीं बढ़ती । मेरी महिमा को तो ये सकाम भक्त ही अधिक बढ़ाते हैं । भगवान ने कहा कि निष्काम भक्त के विषय में लोग प्रशंसा करते हुए यही कहते हैं कि ये कितना निष्काम है जो कि भगवान से भी कुछ नहीं चाहता । पर सकाम भक्त को देखकर लोग कहेंगे कि भगवान कितने उदार हैं कि जो सकाम को भी चाहते हैं । तो भई ! मेरी कीर्ति तो इन्हीं की कृपा पर बनी हुई है इसीलिए मैं इनको अधिक चाहता हूँ । पर इसका मुख्य तात्पर्य यह है कि जैसे प्रत्येक बालक की चाहना के अनुकूल ही माँ उससे व्यवहार करती है उसी तरह भगवान भी सुग्रीव को मिठाई देते हैं । पर केवल मिठाई ही देते हों ऐसी बात नहीं, आवश्यकता पड़ने पर दवाई भी देते हैं ।
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