Saturday, 11 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

रामायण में निषादराज और भगवान राम की मित्रता का पूरा प्रसंग ही वर्णित है, पर बड़ी विचित्र बात है कि मैंने आज तक लोगों को इस प्रसंग से पंक्ति उद्धृत करते नहीं देखा । इसका अभिप्राय है कि जो हजारों पंक्तियाँ हैं, वे तो लोगों को महत्वपूर्ण प्रतीत नहीं होती हैं, लेकिन किसी संदर्भ विशेष में अगर एक भिन्न प्रकार की पंक्ति कह दी गयी तो यह आग्रह किया जा रहा है कि गोस्वामीजी का सिध्दांत यही है । निषादराज जाति की दृष्टि से चाहे जो हों पर भगवान राम की विशेषता यह है कि वे जिससे मिलते हैं उसी से कह देते हैं कि हम तो बिल्कुल तुम्हारी तरह ही हैं । मित्रता तो बहुधा बराबरी में होती है । अगर इस दृष्टि से मित्रता करें तो भगवान राम की क्षत्रियों से मित्रता होनी चाहिए,  राजकुमारों से मित्रता होनी चाहिए । लेकिन भगवान राम निषादराज को ह्रदय से लगाकर कहते हैं - मित्र ! आपसे बढ़कर मित्र कौन होगा, जो मित्र के संकट के समय सहायता करने के लिए इतना व्यग्र हो जाय । और कहा - भई ! तुम तो मेरे बड़े सुजान सखा हो । निषादराज संकोच में पड़ गये - महाराज ! कहाँ मैं मल्लाह और कहाँ आप । भला मेरी आपकी क्या मित्रता ? भगवान ने कहा - नहीं मित्र ! हमारा और तुम्हारा कार्य एक ही है । तुम्हारा भी कार्य पार उतारना है और मेरा भी कार्य पार उतारना है । हम दोनों एक ही जाति के हैं इसीलिए हमारी ओर तुम्हारी मित्रता में रंचमात्र भी सन्देह नहीं होना चाहिए । इस प्रकार भगवान राम उनकी निष्कामता का सम्मान करते हैं । उनको मित्र कहकर पुकारते हैं । क्योंकि निषादराज शरीर से चाहे जिस जाति के हों, पर अन्तःकरण की दृष्टि से वे शरीर से सर्वथा ऊपर उठे हुए हैं । वे भावना के राज्य में रहने वाले हैं, उनका चरित्र भावप्रधान है ।

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