Friday, 3 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जब सुग्रीव ने भगवान राम और लक्ष्मण जी को आते देखा तो उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आप जरा ब्राह्मण का रूप बनाकर जाइये और देखकर मुझे वहीं से संकेत कर दीजियेगा कि यह कौन है ? हनुमान जी ने पूछा कि अगर बालि के भेजे हुए हैं तो आप क्या करेंगे ? सुग्रीव ने कहा - बस अपने पास तो एक ही कला है । क्या ? बोले - मैं यहाँ से भाग जाऊँगा । इस प्रसंग में बड़ी अनोखी सी बात यह है कि हनुमान जी कभी न भागने वाले, और सुग्रीव जी बड़े भगोड़े हैं तो अब दोनों में किसका मार्ग ठीक है ? इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि भागने का भी सदुपयोग होना चाहिए और न भागने का भी । इसलिए सुग्रीव यद्यपि बड़े डरपोक हैं और हनुमान जी में डर का लेश भी नहीं है । पर भगवान राम की महानता यह है कि उन्होंने निडर और डरपोक दोनों को ही स्वीकार किया । निर्भीक हनुमान जी तो उनके महान सेवक हैं ही, पर भगवान ने सुग्रीव के भय का भी सदुपयोग कर लिया ।

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