श्री हनुमान जी के जीवन में ज्ञान, कर्म और भक्ति की समग्रता विद्यमान है, वे तो महान ज्ञानी, महान कर्मयोगी तथा महान भक्त हैं । हनुमान जी के चरित्र में शरीर का सर्वोच्च सदुपयोग है, भावना का भी सर्वश्रेष्ठ उपयोग है और विवेक का भी उत्कृष्ट प्रयोग है । रामायण में भगवान श्रीराघवेन्द्र उनके इन तीनों योगों का सदुपयोग करते हैं । उनके विचार का सदुपयोग करते हैं, उनकी भावना का सदुपयोग करते हैं तथा उनके शरीर के द्वारा भी निरन्तर उनसे सेवा लेते हैं ।
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