रामचरितमानस में बालि और सुग्रीव प्रसंग को पढ़कर बड़ा अटपटा सा लगता है । क्योंकि बालि और सुग्रीव दो भाई आये भगवान के सामने । इनमें से एक पर भगवान ने बाण चलाया तथा दूसरे को बचाया । पर अगर विचार करके देखें तो हमें यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि भगवान तो बालि का भी कल्याण चाहते हैं । परन्तु वह तो सुग्रीव से भिन्न स्थान में रहने वाला है । सुग्रीव बेचारे तो शरीर में ही स्थित हैं । पर यह बालि तो अभिमान के नगर में स्थित है । और भगवान का सामंजस्य है कि वे सुग्रीव को पहले मिठाई देते हैं, बाद में दवाई । और बालि को प्रभु ने पहले दवाई दी, तथा बाद में मिठाई । सचमुच प्रभु के व्यवहार में यह बड़ी अनोखी पद्धति है । बालि पर पहले बाण चला दिया । किन्तु यह बाण- बाण नहीं, अपितु प्रभु की कड़वी दवा है । इसलिए प्रभु ने लक्ष्मणजी से कहा कि मैं सुग्रीव पर भी वही बाण चलाऊँगा जो बालि पर चलाया था । लक्ष्मणजी ने कहा - प्रभु ! न तो आपके पास बाणों की कमी है और न ही मेरे पास, तो कोई और बाण चलाइये न ! किन्तु भगवान ने कहा कि नहीं लक्ष्मण ! जो दवा एक बार परखी हुई हो उसका प्रयोग करने में निश्चिन्तता रहती है । मैंने यह दवा बालि पर चलाकर देख ली है कि इसके लगते ही बालि का अभिमान दूर हो गया था, बालि बिल्कुल बदल गया था । इससे लगता है कि यह दवा तो बहुत बढ़िया है ।
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