मार्ग की भिन्नता के मूल में मान्यता यह है कि वैसे तो अनगिनत प्रकार के व्यक्ति संसार में विद्यमान हैं लेकिन हमारे शास्त्रों ने उन्हें तीन भागों में बांटा है । शास्त्रों में जिस प्रकार का विभाजन किया गया उसका तात्पर्य है कि जितने व्यक्ति हैं, उतने ही *शरीर, मन और बुद्धि* भी होगी । क्योंकि व्यक्ति शरीर, मन और बुद्धि के द्वारा विस्तृत रूप में हमारे समक्ष दिखायी देता है । और भिन्नता यह है कि कुछ लोग शरीर प्रधान हैं जो शरीर नगर में निवास करते हैं । कुछ लोग ऐसे हैं जो बुद्धि प्रधान हैं, जो बुद्धिलोक में निवास करते हैं । शास्त्रों ने बड़ा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण इस रूप में प्रस्तुत किया । क्योंकि जो व्यक्ति शरीर में स्थित है, शरीर के प्रति ही जिसमें ममत्व बुद्धि अधिक है, मन और बुद्धि जिसके जीवन में गौण हैं, उसके जीवन में साधना का जो श्रीगणेश होगा, वह भी स्वाभाविक रूप से शरीर और कर्म के माध्यम से ही होगा । जो मनः प्रधान है, भावना प्रधान है उनके जीवन में भक्ति की मुख्यता होती है । और जो बुद्धि प्रधान व्यक्ति हैं, जिनमें शरीर और मन गौण होते हैं, जो प्रत्येक वस्तु को तर्क और बुद्धि के द्वारा ह्रदयंगम करने की चेष्टा करते हैं, ऐसे लोगों के लिए ज्ञान मार्ग श्रेयस्कर है । इस प्रकार वेदों तथा हमारी समस्त संस्कृति की जो परंपरा है उसमें मनुष्यों के तीन प्रकार के विभाजन करके इन तीन मार्गों का संकेत किया गया है ।
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