श्रीभरत और श्रीलक्ष्मण दोनों भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं । लेकिन दोनों की अवस्थिति भिन्न है । श्रीभरत की भक्ति में ज्ञान की प्रधानता है, तथा श्रीलक्ष्मण की भक्ति में भावना की प्रधानता है । और दोनों की मान्यताएँ भी अलग-अलग हैं । श्रीभरत की मान्यता है कि सारे संसार में भगवान हैं । और लक्ष्मण जी की मान्यता है कि हमारे प्रभु में ही सारा संसार है । भरत जी यह मानकर चलते हैं कि अगर सबकी सेवा करो तो प्रभु की सेवा हो जायेगी और लक्ष्मण जी मानते हैं कि यदि प्रभु की सेवा करो तो संसार की सेवा हो जायेगी । और भगवान राम दोनों के इस अन्तर को जानते हैं । इसीलिए भगवान राम कहते हैं - लक्ष्मण ! अगर तुम पास रहकर मेरी सेवा करना चाहते हो तो जागकर पहरा दो । और भरत से कहते हैं - तुम तो सारे संसार में मुझे देखते हो, अतः लौटकर जाओ और उसी रूप में मेरी सेवा करो । श्रीभरत जी ने भगवान श्रीराघवेन्द्र से कहा - महाराज ! आप मुझे लौटा रहे हैं, तो कुछ तो दीजिए । प्रभु ने पादुका उठाकर दे दी । श्रीभरत जी ने पादुका सिर पर रख लिया । जब श्रीभरत से लोगों ने पूछा - प्रभु ने आपको यह पादुका क्यों दे दी ? श्रीभरत ने कहा - भई ! यह पादुका नहीं दी । तब ? बोले - *भरत मुदित अवलंब लहे ते । अस सुख जस सिय रामु रहे तें ।।* - भगवान राम का उद्देश्य था - भरत ! एक रूप में तो मैं वन में रुक रहा हूँ और पादुका के रूप में तुम्हारे साथ लौट रहा हूँ । किसी ने पूछ दिया - महाराज ! पादुका यहाँ छोड़ दीजिए और श्रीभरत के साथ इस रूप में लौट जाइए । तो प्रभु ने कहा - भई ! इसमें अन्तर यह है कि संसार के जो प्राणी हैं, अगर वे मुझमें ही मुझको पहचान लें, तो भी बड़ी बात है, परन्तु पादुका में भी मुझे पहचानने की दृष्टि तो भरत के ही पास है ।
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