Saturday, 4 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

वर्णन आता है कि जब चार महिने तक सुग्रीव भगवान से मिलने नहीं आये तब प्रभु ने कहा - लक्ष्मण ! मैंने निश्चय किया है कि सुग्रीव का वध भी मैं कल उसी बाण से कर दूँगा जिससे मैंने बालि का वध किया था । लक्ष्मणजी ने कहा - महाराज ! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी जाकर यह कार्य पूरा कर देता हूँ । प्रभु ने कहा - लक्ष्मण ! उसे मारने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि वह तो बड़े डरपोक स्वभाव का था, मैंने डर छुड़ा दिया तो मुझे भी भूल गया । इसलिए तुम जाकर फिर थोड़ा सा डर पैदा कर दो तो फिर से मेरे पास आ जायेगा - बस यही है डर का सदुपयोग । भगवान राम ने कितनी मनोवैज्ञानिक बात कही ? लक्ष्मणजी ने कहा - मैं अभी जाकर डराता हूँ । तो तुरंत हाथ पकड़ लिया भगवान ने । प्रभु का तात्पर्य था कि सावधानी से डराना । क्योंकि वह जितना डरने वाला, उतना ही भागने वाला भी है, तो कहीं ऐसा न डराना कि मुझसे दूर भाग जाय । इसलिए ऐसा डराना कि भाग कर इधर ही आये कहीं उधर न भाग जाये । इसका अभिप्राय है कि अगर कोई पलायन करके भगवान की ओर भागे तो वह पलायन (भागने) का सदुपयोग है ।

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