Monday, 13 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने एक ऐसी बात कही जो सुनने में उल्टी लगती है, पर आप उसका उल्टा अर्थ बिल्कुल मत लीजियेगा, वरन उसके सही तात्पर्य को लेने की आप चेष्टा कीजियेगा । गोस्वामीजी ने विनय पत्रिका के एक पद में कह दिया कि - भगवान कभी-कभी पुण्यत्माओं की अपेक्षा पापियों से अधिक प्रीति करते हैं । और भई ! मैं तो यही कहूँगा कि आप लोग पापी बनने की चेष्टा न कीजियेगा । क्योंकि पापी बनाने के लिए इस पद में प्रोत्साहन दिया जा रहा हो ऐसी कोई बात नहीं है । पर गोस्वामीजी जिस उद्देश्य से यह बात कहते हैं उसे आप समझें । एक बालक स्वस्थ है तथा एक रोगी । माँ रोगी बालक को चिपटाये हुए सो रही है, स्वस्थ बालक को उसने अपने से थोड़ा दूर कर दिया है । इससे स्पष्ट यही है कि उसके मन में उस समय रोगी के प्रति अधिक ममता है । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि माँ यह चाहती है कि बच्चे रोगी बनें । बल्कि वह तो यही चाहती है कि बालक स्वस्थ हो, पर माँ की विशेषता यह है कि जब वह बालक को अस्वस्थ देखती है तो उसे लगता है कि यह अधिक ममता और वात्सल्य का अधिकारी है, क्योंकि इसके रोग को दूर करने के लिए अधिक प्रेम की आवश्यकता है । इसी प्रकार भगवान दीन पर अधिक प्रेम करते हैं, यह बात जो कही जाती है उसका भी तात्पर्य यही है ।

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