Thursday, 23 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

राज्याभिषेक के पश्चात भगवान राम अन्य सभी बन्दरों को कहते हैं - अब तुम घर जाओ, लेकिन श्री हनुमान जी को भेजने की आवश्यकता भगवान राम नहीं समझते हैं । उनके सन्दर्भ में प्रभु दूसरी बात सोचते हैं । कई लोग ऐसे होते हैं कि जिनमें सामीप्य के कारण रस का अभाव हो जाता है । अधिक पास रहने से उन्हें बहुत लाभ नहीं होता । क्योंकि पास रहने से लाभ उठाने वाले मैंने विरले ही व्यक्ति देखे हैं, बहुधा हानि उठाने वाले ही अधिक देखे हैं । लोग बहुधा आश्चर्य करते हैं कि बड़े-बड़े महात्माओं के अत्यंत पास रहने वाले व्यक्तियों का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है । बड़े-बड़े तीर्थों में रहने वाले व्यक्तियों का आचरण तीर्थ के आदर्श से बिल्कुल भिन्न होता है । इसका रहस्य यही है कि जैसे कोई व्यक्ति प्रतिदिन किसी एक ही वस्तु का भोजन करे तो धीरे-धीरे उसे उस वस्तु का स्वाद आना बन्द हो जाता है । इसी प्रकार से कोई व्यक्ति अगर बहुत लम्बे समय तक किसी महापुरुष के साथ रहे अथवा किसी तीर्थ में रहे तो वह उससे प्रेरणा ग्रहण नहीं कर पाता और जो थोड़े समय के लिए जाते हैं वे नयी प्रेरणा ग्रहण करके लौटते हैं । निरन्तर समीप बने रहने वालों में रस की यह भावना समाप्त होकर सांसारिक वृत्ति जाग्रत होते देखी गयी है । जिससे कि वे बदलकर सांसारिक दिखायी देने लगते हैं । ऐसे व्यक्ति अधिक पास न रहकर थोड़ा दूर बने रहकर अगर पास आने की चेष्टा करें तभी उनका कल्याण होगा । पर श्री हनुमान जी के संबंध में ऐसी बात नहीं है । हनुमान जी चाहे दूर रहे, चाहे पास रहें, वे तो सदैव राम-रस में ही निमग्न रहते हैं ।

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