Sunday, 19 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

......कल से आगे......
आगे चलकर भगवान राम जब विभीषण से मिलते हैं तो प्रभु ने उनसे तुरन्त कहा - लंका के राजा कहिये । उस समय प्रभु का वाक्य सुनकर विभीषण जी संकोच में पड़ गये । उन्हें लगा कि अरे ! मेरे मन की चोरी तो प्रभु ने पकड़ ली, मेरे मन में जो वासना आ गयी थी प्रभु उसको जान गये । विभीषण जी ने कहा प्रभु ! मैं छिपाऊँगा नहीं, सचमुच मेरे मन में इच्छा तो एक क्षण के लिए आयी थी, पर ज्योंही मैंने आपके चरणों के दर्शन किये वह बिल्कुल समाप्त हो गयी । प्रभु ! अब तो मुझे बिल्कुल राज्य नहीं चाहिए । पर भगवान श्रीराघवेन्द्र क्या कहते है ? यदि कहीं कह देते कि ह्रदय में कामना है और चले हैं निष्काम बनने, तब तो यह उनकी सर्वज्ञता होती । पर वे तुरन्त मुस्कराकर कहते हैं - अरे मित्र ! तुम्हारे मन में वासना है या नहीं इसमें तो मुझे सन्देह है, पर मेरे मन में तो वासना है ही । विभीषण ने कहा - महाराज ! आप ये राज्य क्या मेरी वासना को देखकर दे रहे हैं । भगवान ने कहा - बिल्कुल नहीं अपितु मैं तो अपनी वासना से दे रहा हूँ । विभीषण जी ने पूछा - महाराज ! देने वाले में वासना होती है कि लेने वाले में ? प्रभु ने कहा - देने वाले में ! भगवान राम का तात्पर्य था कि मित्र ! राज्य की कामना तो कामना है ही, पर उससे भी बड़ी कामना कीर्ति की है । जिसके मन में लेने की कामना है, वह तो बेचारा छोटी कामना वाला है । पर जो दे कर कीर्ति कमाना चाहता है वह बड़ी कामना वाला है । प्रभु कहते हैं - मित्र ! मेरे विषय में यह बड़ा प्रसिद्ध हो गया है कि मैं उदार हूँ, इसीलिए मैं अपना नाम बचाने के लिए तुम्हें दे रहा हूँ, तुम्हारी वासना देखकर नहीं दे रहा हूँ ।

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