भगवान राम साक्षात ईश्वर होते हुए भी जीवन भर किसी न किसी के मार्गदर्शन में चलते रहे । यही महाभारत का भी सूत्र है । क्योंकि युधिष्ठिर से जब पूछा गया कि हम मार्ग का निर्णय कैसे करें ? तो युधिष्ठिर ने यही उत्तर दिया कि हम महापुरुष के पीछे चलें । पहली यात्रा में भगवान श्रीराघवेन्द्र विश्वामित्र के साथ चल रहे हैं । यज्ञ और विश्वामित्र का बड़ा घनिष्ठ संबंध है । विश्वामित्र माने जो सारे संसार का मित्र है । यज्ञ-कर्म माने, जो सम्पूर्ण संसार के कल्याण के लिये किया जाता है, वह यज्ञ-कर्म है । तथा जो केवल अपने स्वार्थ के लिये किया जाता है वह स्वार्थ-कर्म है । भगवान यज्ञ-कर्म करने के लिये जा रहे हैं । यदि प्रश्न किया जाय कि जब आप यज्ञकर्म करेंगे तो विध्न आवेंगे या नहीं ? तो भगवान ने अपने चरित्र के द्वारा बता दिया कि विध्न अवश्य आवेंगे । इस कार्य के लिये जब भगवान बढ़े तो ताड़का आयी, मारीच आया और सुबाहु आया । भगवान राम ने तीनों से अलग-अलग व्यवहार किया । ताड़का को प्रभु ने मार दिया, मारीच को दूर फेंक दिया और सुबाहु को जला दिया । इसका अभिप्राय था कि यज्ञ-कर्म की दिशा में जब हम चलेंगे, तो ताड़का, मारीच और सुबाहु आयेंगे । और तीनों से हम कैसा व्यवहार करें, यह भगवान राम स्पष्ट करते हैं । इस प्रकार यह कर्म मार्ग की यात्रा है ।
No comments:
Post a Comment